मंगलवार, 9 सितंबर 2025
❓क्या आपको पता है....❓
शुक्रवार, 5 सितंबर 2025
नई नवेली दुल्हन
* नई नवेली दुल्हन *
* :- नई नवेली दुल्हन जब ससुराल में आई तो
* उसकी सास बोली :-
बींदणी कल माता के मन्दिर में चलना है।
* बहू ने पूछा :-
सासु माँ एक तो 'माँ' जिसने मुझे जन्म दिया और एक 'आप' हो और कौन सी माँ है ?
सास बडी खुश हुई कि मेरी बहू तो बहुत सीधी है।
* सास ने कहा :-
बेटा पास के मन्दिर में दुर्गा माता है! सब औरतें जायेंगी हम भी चलेंगे।
सुबह दोनों एक साथ मन्दिर जाती है।
.....आगे सास पिछे बहू।
* जैसे ही मन्दिर आया तो बहू ने मन्दिर में गाय की मूर्ति को देखकर कहा :-
माँ जी देखो ये गाय का बछड़ा दूध पी रहा है, मैं बाल्टी लाती हूँ, और दूध निकालते है।
सास ने अपने सिर पर हाथ पिटा कि बहू तो "पागल" है और
* बोली :-
बेटा ये स्टेच्यू है और ये दूध नहीं दे सकती।
चलो आगे।
* मन्दिर में जैसे ही प्रवेश किया तो एक शेर की मूर्ति दिखाई दी।
* फिर बहू ने कहा :-
माँ आगे मत जाओ ये शेर खा जायेगा।
* सास को चिंता हुई की मेरे बेटे का तो भाग्य फूट गया।
और
* बोली :-
बेटा पत्थर का शेर कैसे खायेगा ?
चलो अंदर चलो मन्दिर में, और
* सास बोली :-
बेटा ये माता है,और इससे मांग लो, यह माता तुम्हारी मांग पूरी करेंगी ।
* बहू ने कहा :-
माँ ये मूर्ति तो पत्थर की है ये क्या दे सकती है ? जब पत्थर की गाय दूध नहीं दे सकती ?
पत्थर का बछड़ा दूध पी नहीं सकता ?
पत्थर का शेर खा नहीं सकता ?
तो ये पत्थर की मूर्ति क्या दे सकती है ?
"अगर कोई दे सकती हैं तो वो आप है"
" आप मुझे आशीर्वाद दीजिये "
तभी सास की आँखे खुली वो बहू पढ़ी लिखी थी,
तार्किक थी, जागरूक थी, तर्क और विवेक के सहारे बहु ने सास को जाग्रत कर दिया !
अगर मानवता की प्राप्ति करनी है, तो पहले असहायों, जरुरतमंदों, और गरीबो की सेवा करो
परिवार, समाज में लोगो की मदद करे ।
"अंधविश्वास और पाखण्ड को हटाना ही मानव सेवा है"
"मानव का सफर पत्थर से शुरु हुआ था। पत्थरों को ही महत्व देता है और आज पत्थर ही बन कर रह गया"
--- *यह संसार की रीत है*--
1. चूहा अगर "पत्थर" का तो उसको पूजता है। (गणेश की सवारी मानकर)
लेकिन जीवित चूहा दिख जाये तो पिंजरा लगाता है और चूहा मार दवा खरीदता है।
2. सांप अगर "पत्थर" का तो उसको पूजता है। (शंकर का कंठहार मानकर)
लेकिन जीवित सांप दिख जाये तो लाठी लेकर मारता है, और जब तक मार न दे, चैन नही लेता।
3. बैल अगर "पत्थर" का तो उसको पूजता है। (शंकर की सवारी मानकर)
लेकिन जीवित बैल(सांड) दिख जाये तो उससे बचकर चलता है।
4. कुत्ता अगर "पत्थर" का तो उसको पूजता है। (भैरुनाथ की सवारी मानकर)
लेकिन जीवित कुत्ता दिख जाये तो 'भाग कुत्ते' कहकर अपमान करता है।
5. शेर अगर "पत्थर" का तो उसको पूजता है। (दुर्गा की सवारी मानकर)
लेकिन जीवित शेर दिख जाये तो जान बचाकर भाग खड़ा होता है।
* हे मानव :-
"पत्थर से इतना लगाव क्यों और जीवित से इतनी नफरत क्यो ?"
परमेश्वर माली
गौर से दो बार पढ़े✌
मानव जीवन में तीन बातें महत्वपूर्ण हैं!!
जूतो का सीधा संबंध
जूते इसलिये भी चुराये जाते है क्योकि इसमें थ्रिल है ! जूते चुराना एक बहुत बडा आर्ट है ! बेहद सावधान ,चतुर ,दूरंदेश आदमी ही जूते चुरा सकता है ! किसी दूसरे के नये जूतो मे पैर डाल लेना ,ऐसा करते हुये देख लिये जाने पर अनजाने मे ऐसा कर जाने की एक्टिग करना हर किसी के बस की बात नही ! कला है ये और हर कलाकार की तरह जूते चुराने वालो को भी अपनी प्रतिभा को निखारने के लिये नियमित रूप से मंदिर जाना पडता है !
मंदिर के पास किसी भक्त के उतारे नये जूतो को देखते ही अपने जूते पुराने लगने लगना स्वाभाविक सा ही है ! जूता चुराने वाला मान लेता है कि यह भगवान की इच्छा है कि वो आज नये जूते पहन कर घर जाये ! वह भगवान की बात टाल नही पाता और नये जूतो मे पाँव डाल लेता है !
अब जूते हमे़शा जरूरत के लिये ही चोरी किये जाये ऐसा भी नही है ! जूते सामने पडे है ! जूते नये दिख रहे हैं ! लावारिस है ! जूते उतारने वाला लापरवाह है ! किसी को रखवाली के लिये छोड नही गया है ! अपने आपको ज्यादा चतुर समझता है ! हीरोगिरी झाड रहा है ! बडे बाप की औलाद है ! जूतो की कद्र नही करता ! इन सब वजहो से भी जूते चुराना जरूरी हो जाता है !
सफलता पूर्वक जूता चुरा लेने मे खुशी है वह कोई बडी परीक्षा पास कर लेने या गोल्ड मैडल जीतने से कम नही होती ! जूता चुराने वाले सच्चे देशभक्त हैं ! वे केवल यह चाहते हैं कि आप नये जूते खरीदे ! आप नये जूते खरीदेगे ! अर्थव्यवस्था गति पकडेगी ! देश आगे बढेगा !
भगवान भरोसे रहने वाला कोई भी आदमी कभी यह भरोसा नही कर पाता कि भगवान जी से मिलकर लौटने पर उसकी अपने प्रिय जूतों से फिर मुलाक़ात हो भी सकेगी या नही ,पर मंदिर जाने पर जूते तो उतारना ही पड़ते है ! वह भारी मन से उतारता है जूते ! वैसे ही निहारता है अपने जूतो को ,जिस तरह युद्ध पर जाता फ़ौजी मुडमुड कर अपना बीबी बच्चो को देखता है !
मेरे ख़्याल से जूते ही ज़िम्मेदार है जीवन मरण के सिलसिले के ! ये ना होते तो हम लोग कब के तर गये होते ! होता ये है कि दर्शन करते वक़्त ये मन मे इस कदर घुसे रहते है कि उसमें भगवान के रहने की जगह ही नही बचती ! भगवान के सामने हाथ जोड़े वक्त भी ध्यान भगवान के बजाय जूतों मे लगा रहता है ,चतुर भक्तगण पूरी कोशिश करते है कि उनके जूते उनके क़ाबू मे बने रहे ,वे आमतौर पर अपने जूते मंदिर के प्रवेश द्वार के एन सामने उतारते है ताकि भगवान और जूतों को एक साथ देखा जाना सँभव हो सके, पर्याप्त सावधान भी बने रहते है पर भगवान की ही वजह से एकाध सैकेंड की चूक हो ही जाती है और भाई लोग आपके जूते पहन जाते है ,जूता चुराने वाले किसी भक्त की तुलना मे अपने लक्ष्य के प्रति ज्यादा एकाग्र और समर्पित होते है ! आप नंगे पाँव घर लौटते हैं और लौटते वक्त पूरे टाईम यह सोच सोच कर कन्फ़्यूज होते रहते है कि भगवान आपके और जूता चोर मे से किसका ज्यादा सगा है !
मंदिरों के जूता चोरों से अपने जूते बचाने के लिये श्रद्धालुओं द्वारा अनादि काल से तरह तरह से उपायों का अविष्कार किया जाता रहा है ,और इनमें से अपने दोनो पाँव के जूतों को एक दूसरे से अलग अलग ,पर्याप्त दूरी पर रख कर मंदिर मे प्रवेश करने का तरीका सर्वाधिक लोकप्रिय उपाय माना गया है ,मै खुद इस उपाय को आज़मा कर अनेक बार अपने जूतों को वापस पाने मे सफल हो चुका हूँ , कुछ लोग मंदिर जाने के लिये फटे पुराने जूते इस्तेमाल करते है और बहुत बार यह तरीका भी कारगर होता है .जूता चोर आपकी ग़रीबी पर तरस खा कर आपको बख़्श देते है ,अपनी कार मे ही जूते उतार जाना भी अपने जूतों के साथ बने रहने के आजमाये हुये सफल तरीक़ों मे से एक है ! पर यदि आप बे कार है तो कार वाला फ़ार्मूला आपके लिये नही है !
आप अपनी सुविधानुसार ऊपर लिखे इन तरीक़ों मे से किसी को भी आज़मा सकते है पर ये हमेशा काम करेंगे इसकी कोई गारंटी भगवान भी नही दे सकते !
सच्ची बात तो यह है कि जूते होते ही चोरी हो जाने के लिये हैं ! जूतों को चोरी होना है तो वे होगें ही ,मेरा यह मानना है कि मंदिर में प्रवेश करते वक्त ही यह मान लेना चाहिये कि ये जूते मुझसे पहले किसी और के थे और मेरे बाद किसी और के होगें, इसीलिये इस क्या लाया है और क्या ले जायेगा के ज्ञान को मानने वाले सच्चे आराधक मंदिर मे भगवान के सामने होते वक्त जूतों को लेकर क़तई विचलित नही होते ,वे पूरी तन्मयता से भगवान का ध्यान करते है ,और मंदिर से बाहर निकलने पर यदि वे पाते है कि उनके जूते अन्तर्ध्यान हो चुके हैं तो वे उतनी ही तन्मयता से अन्य श्रध्दालुओं द्वारा उतारे गये जूतों के ढेर से ऐसे जूते तलाश करते है जो उनके अपने चोरी जा चुके जूतों से अधिक बेहतर और नये से हों ,वे उन्हे निसंकोच पहनते हैं और भगवान का आभारी होते हुये सकुशल घर लौट आते हैं ,मंदिर से जूते पहन कर लौटने का यह सर्वाधिक कारगर और लोकप्रिय तरीका है ,और मै खुद इसी उपाय पर भरोसा करता हूँ और मंदिर से दसियो बार जूते चोरी होने के बावजूद इसी उपाय की कृपा से कभी नंगे पाँव घर नही लौटा ,और जूते भी हमेशा नये के नये ही बने रहे ! चूँकि आप भी समझदार है इसलिये मुझे पूरा विश्वास है कि भविष्य मे जब भी ऐसा मौका आयेगा आप भी मंदिर से लौटते वक्त बेहतर जूतों के साथ ही घर लौटेंगे !

