शनिवार, 13 जून 2015

जानिए पूरे घर से जुड़ी वास्तु टिप्स, ऐसे बनाएं 

अपने सपनों का आशियाना बनवाते समय हर कोई यही चाहता है कि उसके इस घर में सुख-समृद्धि बनी रहे, लेकिन कई बार ऐसा नहीं हो पाता। इसका कारण वास्तु दोष भी हो सकता है। इसलिए मकान बनवाते समय कुछ वास्तु नियमों का ध्यान रखा जाना आवश्यक होता है अन्यथा आगे जाकर कई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं।
आज हम आपको मकान के लगभग हर हिस्से से जुड़ी कुछ वास्तु टिप्स के बारे में बता रहे हैं। मकान बनाने की पहली प्रक्रिया भूखंड (प्लॉट) चयन से होती है। अगर आप वास्तु अनुरूप प्लॉट खरीदना चाहते हैं, तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें-
सिद्धांत- प्लॉट पर भवन का निर्माण करवाते समय इस बात का ध्यान रखें कि उसके केवल 60 प्रतिशत भाग पर ही निर्माण करवाएं यदि अधिक निर्मित भाग की आवश्यकता न हो तो इससे अधिक भाग भी खुला छोड़ा जा सकता है।
1. यदि कोने का प्लॉट हो तो सर्वश्रेष्ठ होगा।
2. आपका प्लॉट आस-पास के अन्य प्लॉटों या बस्ती से नीचे नहीं होना चाहिए। नहीं तो बरसात के दिनों में पानी आपके घर में घुस सकता है। साथ ही घर में हवा भी पर्याप्त नहीं आ सकेगी।
3. गंदा नाला, प्रदूषण वाली फैक्टरी, गंदगी, श्मशान, कब्रिस्तान अथवा मुर्दा-मवेशी निस्तारण आदि स्थानों के पास प्लॉट न लें।
4- प्लॉट के आस-पास जीर्ण-शीर्ण मकान, पुराना कुआं, क्षतिग्रस्त मंदिर या गड्ढा नहीं होना चाहिए। इससे नकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होने से वास्तु का आभामंडल प्रभावित होगा।
5- ऐसे प्लॉट का चयन करें जिसके उत्तर में आम रास्ता हो। इससे घर का प्रवेश द्वार उत्तर में रखा जा सकता है।
6- यदि आपके भूखंड के पूर्व की तरफ आम रास्ता निकलता हो तो भी बेहतर रहेगा। क्योंकि पूर्व दिशा से ही सूर्य निकलता है। ऐसे में पूर्व दिशा में घर का मुंह रखना शुभ व स्वास्थ्यवर्धक है।
7. संभव हो तो दक्षिणमुखी प्लॉट लेने से बचें।

कैसा हो आपके प्लॉट का साइज?
1. संभव हो तो चौकोर अथवा आयताकार प्लॉट खरीदें।
2. आदर्श प्लॉट की चौड़ाई तथा लंबाई का अनुपात 2:3 होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर- 40*60 वर्ग फुट का प्लॉट।
3. गौमुखी प्लॉट को सबसे शुभ माना जाता है। अर्थात ऐसा भूखंड जो सामने की तरफ से कम चौड़ा व पीछे से अधिक चौड़ा हो।
4. अगर उद्योग के लिए प्लॉट खरीद रहे हैं तो नाहरमुखी प्लॉट भी खरीद सकते हैं। अर्थात जिसकी आम रास्ते की तरफ वाली भुजा पीछे की भुजा से बड़ी हो।
5. प्लॉट के सामने पार्क हो या खुला स्थान हो तो बेहतर रहेगा।

घर में ऐसी होनी चाहिए पानी की व्यवस्था
घर बनवाते समय उसमें पानी की व्यवस्था के बारे में जरूर विचार करना चाहिए, क्योंकि यदि घर में समुचित पानी की व्यवस्था नहीं होगी तो इसके कारण आने वाले समय में परिवार के सदस्यों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इसके लिए इन बातों का ध्यान रखें-
1. बोरिंग, कुआं या भूमिगत वॉटर टैंक प्लॉट के उत्तरी ईशान या पूर्वी ईशान में ही बनवाएं। यदि संभव न हो तो उत्तर दिशा में भी बोरिंग आदि करवाया जा सकता है। अन्य दिशाओं में बोरिंग, कुआं आदि का निर्माण शुभ नहीं माना गया है।
2. बोरिंग मेन गेट, मुख्य द्वार के सामने न हो। चौक के बीच में, मकान की दीवार, बाथरूम, नाली या सैप्टिक टैंक के पास बोरिंग या कुआं नहीं होना चाहिए।
3. बोरिंग के लिए ऐसे स्थान का चयन करें, जहां आना-जाना कम हो तथा कीचड़ न हो। जहां से पानी सुगमता से टैंक में पहुंच जाए। साथ ही इन बातों का भी ध्यान रखें कि बिजली की लंबी लाइन न बिछानी पड़े।
4. अगर मकान के ऊपर पानी की टंकी बनवाना हो तो नैऋत्य कोण (पश्चिम-दक्षिण) उपयुक्त रहेगा।
5. सबसे अधिक गौर करने वाली बात है, भवन के समस्त जल का निष्कासन पूर्व, वायव्य (पश्चिम-उत्तर), उत्तर या ईशान(उत्तर-पूर्व) कोण में हो।

कैसी होनी चाहिए भवन की नींव?
मकान की नींव ही उसकी मजबूती का आधार होती है। नींव खुदवाते समय इन बातों पर गौर करें-
1. नींव ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) से खोदनी प्रारंभ करना चाहिए। फिर आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) व वायव्य कोण (पश्चिम-उत्तर) की तरफ नींव खोदनी चाहिए। इसके बाद आग्नेय से नैऋत्य (पश्चिम-दक्षिण) व वायव्य से नैऋत्य की ओर खुदवाना चाहिए।
2. सर्वप्रथम नैऋत्य (पश्चिम-दक्षिण) से आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) व नैऋत्य से वायव्य (पश्चिम-उत्तर) की तरफ नींव भरवाना चाहिए। उसके बाद आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) से ईशान (उत्तर-पूर्व) की तरफ बढ़ते हुए नींव भरवानी चाहिए।
3. प्लींथ के ऊपर यदि दीवारों की मोटाई 25 इंच रखना चाहते हैं तो प्लींथ तक कम से कम दो फुट चौड़ी दीवार बनवानी चाहिए। यदि ऊपर केवल नौ इंच मोटी दीवारें बनवानी हों तो प्लींथ की दीवारों की मोटाई 15 से 18 इंच तक रखी जा सकती है। आपके प्लॉट की प्लींथ उसके आस-पास निर्मित भवनों से अधिक होना चाहिए। इससे हीन भावना आपके घर में प्रवेश नहीं करेगी।
4. यदि प्लॉट के आस-पास मकान नहीं भी बनें हो तो भी प्लींथ पर्याप्त ऊंची रखनी चाहिए ताकि भविष्य में भी आप हीन भावना से ग्रसित न हों।


कैसा हो आपका रसोई घर?
रसोई (किचन) घर का मह्त्वपूर्ण हिस्सा होती है। यहां अन्नपूर्णा मां का वास भी माना जाता है। रसोई का निर्माण करवाते समय इन बातों का विशेष ध्यान रखें-
1. रसोई घर आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण) में बनवाना चाहिए। यदि आग्नेय कोण में संभव न हो तो वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में भी बनवाई जा सकती है। रसोई के लिए नैऋत्य कोण (पश्चिम-दक्षिण) कम फलदायक होता है, जबकि ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में रसोई न हीं बनवाएं तो अच्छा है।
2. रसोई घर आग्नेय कोण में बनवाने के पीछे प्राकृतिक कारण भी है। चूंकि हवा प्राय: वायव्य कोण से आग्नेय कोण की ओर चलती है। इसलिए वास्तु शास्त्र में अग्नि यंत्र आदि के लिए आग्नेय कोण को सर्वश्रेष्ठ माना है। इसके पीछे तर्क है कि रसोई घर में फैलने वाली गंध, धुआं व गर्मी घर से बाहर नहीं निकलेगी तो पूरे मकान का वातावरण अशुद्ध हो जाएगा। यदि हवा वायव्य कोण से आग्नेय कोण की ओर बहेगी तो रसोई की सारी गंदगी, बदबू व गर्मी खिड़की के रास्ते घर से निकल जाएगी।
3. रसोई घर न अधिक बड़ा हो न अधिक छोटा। सामान्य आकार (50 वर्ग फुट) का रसोई घर होना चाहिए।
4. वर्तमान में कलात्मक रसोई घर बनवाने का प्रचलन है। इसलिए रसोई घर चार कोण, षटकोण या अष्टकोण का हो सकता है।
5. रसोई में एक खिड़की ऐसी बनवाएं, जो पूर्व दिशा को ओर खुले ताकि सूर्य की प्रात:कालीन किरणें रसोई घर में प्रवेश कर विषैले कीटाणुओं से मुक्त कर दे तथा नमी, सीलन आदि को भी समाप्त कर दे।



कैसा हो डाइनिंग रूम?
वर्तमान समय में डाइनिंग हॉल का चलन बढ़ गया है। पहले भी भोजन कक्ष होते थे किंतु उनका आकार-प्रकार अलग ही होता था। घर में डाइनिंग हॉल होना संपन्नता की निशानी है। डाइनिंग हॉल बनवाते समय इन बातों का ध्यान रखें-
1. जहां तक संभव हो भोजन कक्ष (डाइनिंग रूम) भवन के पश्चिम अथवा पूर्व में बनवाना चाहिए।
2. भोजन कक्ष के ठीक सामने मुख्य द्वार या शौचालय न हो।
3. भोजन पकाने और भोजन करने में दो विपरीत उर्जाएं काम में आती हैं। इसलिए बेहतर है कि भोजन कक्ष, रसोई घर से अलग ही हो।
4. भोजन कक्ष का फर्श घर के अन्य कमरों के फर्श से नीचा न हो। यदि संभव हो तो रसोई व भोजन कक्ष के फर्श को भवन के शेष फर्श से थोड़ा ऊंचा रखा जा सकता है। इससे हीन भावना नहीं आएगी। जहां तक संभव हो डाइनिंग टेबल आयताकार ही हो।
5. टाण्ड या अलमारी के नीचे बैठकर भोजन नहीं करें। इससे मानसिक दबाव बनेगा, जिसका असर पाचन क्रिया पर पड़ेगा। भोजन कक्ष में हवा व प्रकाश का पर्याप्त प्रबंध होना चाहिए।

ऐसी होना चाहिए कमरों की लंबाई, चौड़ाई व ऊंचाई
कमरों की संख्या में भले ही समझौता कर लें, किंतु कमरों की लंबाई, चौड़ाई व ऊंचाई में कभी समझौता नहीं करें। जानिए कैसी होना चाहिए कमरों की लंबाई, चौड़ाई व ऊंचाई-
1. कमरे की ऊंचाई, चौड़ाई के बराबर या इससे अधिक ही होनी चाहिए। यदि इस सिद्धांत का पालन किया जाए तो वास्तु शास्त्र के अधिकांश नियमों की पालन स्वत: ही हो जाता है।
2. लिविंग रूम हवादार, प्रकाश युक्त व शीतलता देना वाला तभी हो सकता है, जब उसकी लंबाई, चौड़ाई व ऊंचाई पर्याप्त हो। लिविंग रूम की ऊंचाई 11 फुट से कम नहीं होनी चाहिए।
3. बाथरूम, स्टोर रूम आदि के ऊपर दुछत्ती डलवाते हुए छोटी साइज के स्टोर रूम बनवा सकते हैं। इन दुछत्तियों की ऊंचाई चार फुट से कम न रखी जाए ताकि सामान रखने व उतारने में आसानी रहे।
4. वर्तमान में आर.सी.सी की छत का चलन है। आर.सी.सी. के पिलर (कॉलम) बनते हैं। आर.सी.सी. के ही बीम डाले जाते हैं। इसलिए लंबाई, चौड़ाई व ऊंचाई अपनी मर्जी के अनुसार रखी जा सकती है।

कैसा हो घर का पूजा स्थल या मंदिर?
घर में पूजा स्थल होने से मन को शांति मिलती है और अगर यह वास्तु सम्मत हो तो और भी शुभ फल देता है।
1. घर में पूजा स्थल होना शुभता का परिचायक है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। घर की पवित्रता भी बनी रहती है। वहीं अगरबत्ती आदि के धुएं से वातावरण सुगंधित रहता है। विषाणु व कीटाणु घर में प्रवेश नहीं करते।
2. पूजा स्थल पूर्वी या उत्तरी ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में होना चाहिए। पूजा करने वाले का मुंह पश्चिम में हो तो अति शुभ रहता है। इसके लिए पूजा स्थल का द्वार पूर्व की ओर होना चाहिए।
3. शौचालय तथा पूजा घर पास-पास नहीं होना चाहिए। पूजा स्थल के समक्ष थोड़ा स्थान खुला होना चाहिए जहां आसानी से बैठा जा सके।
4. पूजा स्थल के नीचे कोई भी अग्नि संबंधी वस्तु जैसे- इन्वर्टर या विद्युत मोटर नहीं होना चाहिए। इस स्थान का उपयोग पूजन सामग्री, धार्मिक पुस्तकें, शुभ वस्तुएं रखने में किया जाना चाहिए।
5. पूजन में मूर्तियां अधिक न रखें। इस बात का विशेष ध्यान रहे कि गणेश, लक्ष्मी और सरस्वती की मूर्तियां खड़ी स्थिति में न हो।
6. पूजा स्थल का उपयोग ध्यान, संध्या या योग के लिए भी किया जा सकता है। इस स्थान को शांत रखें। धीमी रोशनी वाले बल्ब लगाएं। अंधेरा व सीलन न हो। जब भी आपका मन अशांत हो, यहां आकर आप नई ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं।

कैसी हो विद्युत एवं प्रकाश व्यवस्था?
घर चाहे बड़ा हो या छोटा, कच्चा हो या पक्का, गांव में हो या शहर में बिजली कनेक्शन आवश्यक है। अब तो बिजली हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुकी है। जानिए घर बनवाते समय विद्युत एवं प्रकाश व्यवस्था किस प्रकार की होनी चाहिए-
1. वास्तु शास्त्र के अनुसार बिजली का मीटर, जनरेटर, इनवर्टर आदि घर के आग्नेय कोण में ही स्थापित करवाने चाहिए। ऐसा करना संभव नहीं हो तो वायव्य कोण में भी लगाए जा सकते हैं।
2. आपके घर का प्रवेश द्वार जिस दिशा में हो, सामान्यत: बिजली का मीटर भी उसी दिशा में लगाया जाता है। वैसे अपनी सुविधानुसार मीटर बोर्ड आदि लगवा सकते हैं। प्रत्येक कमरे में प्रवेश करते समय दाईं तरफ स्विच बोर्ड लगवाने चाहिए।
3. बिजली फिटिंग हेतु निर्माण कार्यों के साथ-साथ ही आवश्यक कार्य करवाते रहें ताकि बाद में तोड़-फोड़ व खुदाई न करवानी पड़े।

घर में नहीं होना चाहिए तहखाना
बेसमेंट (तलघर या तहखाना) सभी घरों में नहीं बनवाया जाता। कुछ लोग ही इसे बनवाते हैं। यह सिर्फ जरूरत के हिसाब से ही बनवाया जाता है। वास्तु के अनुसार घर में तहखाना होना ही नहीं चाहिए। यदि बनवाना आवश्यक हो तो नीचे लिखी बातों का ध्यान अवश्य रखें-
1. जहां तक हो सके घर में तहखाना बनाने से बचें, क्योंकि तहखाना अंधकार का सूचक है जो घर में प्रवेश करने वाली ऊर्जा का क्षय करता है। 2. तहखाना न बनवाने के पीछे एक तर्क यह भी है कि उससे संबंधित आशंकाओं का आपकी दिनचर्या पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा नींद भी पूरी नहीं होती।
3. ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) तहखाना बनवाने के लिए उपयुक्त है।
4. व्यवसायिक भवनों/दुकानों के नीचे बेसमेंट की उपयोगिता है। इसलिए अवश्य बनवाना चाहिए।
5. आवासीय भवनों में यदि बेसमेंट बनवाएं तो वास्तु सम्मत हो इस बात का विशेष ध्यान रखें। बेसमेंट का आकार चूल्हे जैसा न हो।

कैसा हो आपका बेडरूम?
मनुष्य अपने जीवन का एक-तिहाई हिस्सा सोने में गुजारता है और यदि औसतन आयु 70 वर्ष मान लें तो सोने में बीतने वाला कुल समय 23 साल से अधिक होगा। यह तथ्य बेडरूम को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है, क्योंकि बेडरूम की ऊर्जा हमें दिनभर प्रभावित करती है। यदि ऊर्जा का प्रवाह ठीक तरह से नहीं हो रहा हो तो नतीजतन हमारी शारीरिक ऊर्जा को नुकसान पहुंचेगा। इससे दु:स्वप्न, अनिद्रा और गहरी उदासी जैसी अनेक स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं। शयनकक्ष की सबसे अच्छी स्थिति घर के दक्षिण-पश्चिम में होती है, क्योंकि इसका संबंध पृथ्वी तत्व से होता है, जो स्थिर और निष्क्रिय है।
यह नींद के लिए सबसे शांतिपूर्ण और आरामदायक स्थितियां प्रदान करता है। यदि दक्षिण-पश्चिम का कमरा बेडरूम के तौर पर नहीं बनाया जा सकता हो तो घर के पश्चिम या दक्षिण की तरफ में से किसी एक ओर का कमरा बेडरूम के तौर पर नहीं बनाया जा सकता हो तो घर के पश्चिम या दक्षिण की तरफ में से किसी एक ओर को चुनना चाहिए। यदि आपका मकान बहुमंजिला हो तो बेडरूम भूतल पर नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि यहां ऐसा लगेगा जैसे कोई आपकी गतिविधियों पर नजर रख रहा है। बड़े कमरों में से किसी एक कमरे को बेडरूम बनाना चाहिए।

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